मुख्यपृष्ठ

संस्था प्रमुख

(ऊँ श्री चिन्मय सदगुरुवे नम:)

 

(पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी ध्यान मुद्रा में) 

इस समय चिन्मय मिशन के परमाध्यक्ष पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी है। उनका जन्म मराठा परिवार में 30 जून 1950 को मध्य प्रदेश में हुआ था। 20 वर्ष की आयु में जब वे विज्ञान से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके थे, स्वामी चिन्मयानन्द के सम्पर्क में आये। उनसे सुधाकर को इतनी अधिक प्रेरणा प्राप्त हुई कि वे अपनी माँ की स्वीकृति लेकर मुम्बई में चिन्मय मिशन के वेदान्त पाठ्यक्रम में सम्मिलित हो गये।

 

वेदान्त अध्ययन पूरा समाप्त करने के बाद सुधाकर ब्र. विवेक चैतन्य हो गये और उनको चिन्मय मिशन केन्द्र भूपाल, कानपुर और सिद्धवाड़ी में नियुक्त किया गया। वे सांदीपनि हिमालय के प्रथम आचार्य बने और उन्होंने ही सिद्धवाड़ी में हिन्दी वेदान्त प्रशिक्षण प्रारम्भ किया।

 

स्वामी चिन्मयानन्द जी ने उन्हें 21 अक्टूबर 1983 को संन्यास की दीक्षा दी और उनका नाम स्वामी तेजोमयानन्द जी रख दिया। उसके बाद उन्हें सांदीपनि साधनालय मुम्बई में अंग्रेजी माध्यम से वेदान्त पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया गया। वहाँ उन्होंने दो ब्रह्मचारी सत्रों में वेदान्त का अध्ययन कराया। उनके पढ़ाये हुए कई ब्रह्मचारी इस समय वेदान्त के बड़े अच्छे प्रवक्ता है। सन 1989 में स्वामी तेजोमयानन्द जी को सेन जोसे अमेरिका भेज दिया गया । वहाँ वे चिन्मय मिशन (पश्चिम) के आचार्य बनाये गये।       

 

अगस्त 1993 में स्वामी चिन्मयानन्द जी की महासमाधि के बाद स्वामी तेजोमयानन्द जी भारत लौट आये और चिन्मय मिशन के परमाध्यक्ष हो गये। उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ यह पद संभाला। तब से वे अपने गुरुदेव के महान उद्देश्यों की पूर्ति में लगे हुए हैं। वे उदारचेता और प्रत्युत्पन्न मति के धनी हैं। उनके संरक्षण में अनेक योजनाओं को मूर्तमान रूप प्राप्त हुआ, जैसे कोयम्बटूर का अन्तर्राष्ट्रिय विद्यालय,  देहली का विश्व सद्भावना केन्द्र, कोचीन का चिन्मय अन्तर्राष्ट्रीय फाउन्डेशन, चेन्नई का चिन्मय हेरीटेज सेन्टर और बंगलौर में चिन्मय मिशन के अस्पताल का विकास।

 

चिन्मय मिशन के कार्यों का संचालन करने के साथ स्वामी तेजोमयानन्द जी सारे विश्व में ज्ञानयज्ञ करते हुए विचरण करते रहते हैं। वे हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं में वेदान्त ज्ञान का प्रसार करते हैं। उनके प्रेमपूर्ण और हँसमुख स्वभाव सभी को प्रिय लगता है। उनके भजन बड़े प्रसिद्ध हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में अनेक पुस्तकें लिखीं है, जैसे भक्तिसुधा ,ज्ञानसार, मन:शोधनम्, और ध्यानस्वरूपम्। उन्होंने कई पुस्तकों पर भाष्य भी लिखे है, जैसे कपिलगीता, योगवासिष्ठ, उपदेशसार, दृग्दृश्यविवेक और सद्दर्शन। स्वामी चिन्मयानन्द जी की लिखी अंग्रेजी पुस्तकों का उन्होंने अनुवाद किया है। उनमें गीता का हिन्दी अनुवाद एक बड़ा कार्य है।

 

वर्तमान काल में स्वामी तेजोमयानन्द जी वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान हैं। उनहोंने वेदान्त ज्ञान के साथ भक्ति की मधुरता भी बड़ी कुशलता से जोड़ रखी है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके व्यक्तित्व में वही आदर्श मूर्तमान हैं।