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पूज्य
गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द
जी का जन्म
दक्षिण भारत के केरल प्रान्त में हुआ था। वह एक
ऐसी
पुण्यतिथि थी जिसमें जन्म लेकर भारत के आध्यात्मिक
इतिहास में एक मोंड़ ला दिया। उनका जीवन और उनका कार्य
युगान्तकारी सिद्ध हुआ। उसका प्रभाव आज हम सब लोग
स्पष्ट
रुप
से
अनुभव
कर
रहे
है।
पूज्य
स्वामी
जी
का
जन्म
8 मई
1916
को
एक
संभ्रांत
परिवार
में
हुआ।
वहाँ
भौतिक
समृद्धि
और
धार्मिक
परिवार
जन्म
से
ही
देखने
को
मिला।
उनके
पिता
न्याय
विभाग
में
एक
न्यायाधीश
थे।
समाज
में
उनका
सम्मान
था
और
वे
अर्थ
से
संपन्न
थे।
परिवार
में
एक
छोटा
मंदिर
था
जिसमें
प्रात:
काल
विस्तृत
पूजन
होता
था
और
सायंकाल
आरती
होती
थी।
उसमें
परिवार
के
बच्चों
को
भी
भाग
लेना
अनिवार्य
था।
वे
भी
उस
पूजन
में
बाल
स्वभाव
की
भक्ति
के
साथ
भाग
लेते
थे।
उन
धार्मिक
कृत्यों
का
प्रभाव
उनके
जीवन
में
बड़ी
गहराई
से
पड़ा।
यद्यपि
शिक्षा
काल
में
उनकी
धार्मिक
चेतना
परिच्छिन्न
सी
हो
गई,
किन्तु
अनुकूल
अवसर
पाकर
वह
ऐसी
पल्लवित
हुई
कि
उनका
समग्र
जीवन
धर्म
और
आध्यात्म
से
परिपूर्ण
हो
गया।
उनकी
प्रारम्भिक
शिक्षा
पाँच
वर्ष
की
आयु
में
स्थानीय
विद्यालय
श्री
राम
वर्मा
ब्याज
स्कूल
में
हुई।
उनकी
मुख्य
भाषा
अंग्रेजी
थी
और
पढ़ाई
जाने
वाली
पुस्तकें
इंगलैण्ड
से
आती
थी।
उनमें
सभी
चित्र
अंग्रेजो
के
होते
थे
और
वही
के
पेड़
पौधे
और
पशुओं
के
पढ़ाये
जाते
थे।
बालकृष्ण
को
यह
शिक्षा
प्राप्त
करने
में
कोई
कठिनाई
नही
हुई।
उनकी
बुद्धि
तीव्र
थी
और
पढ़ने
मे
होशियार
थे।
उनकी
गिनती
आदर्श
छात्रों
मे
थी।
उनकी
खेलने
मे
भी
रुचि
थी।
बैडमिन्टन
उनका
प्रिय
खेल
था।
बालकृष्ण
के
एक
बड़े
भाई
बालचेट्टन
और
दो
बड़ी
बहनें
थी।
एक
बहिन
का
नाम
पद्मिनी
था।
इनके
साथ
बालकृष्ण
के
बड़े
मधुर
सम्बन्ध
थे
और
जीवन
भर
ऐसे
ही
रहे
।
इन
सबका
जीवन
कभी
अभाव
में
नही
रहा।
बालकृष्ण
को
संक्षेप
में
बालन
कहते
थे।
उन्हें
भी
जिस
वस्तु
की
आवश्यकता
होती
थी,
मिल
जाती
थी।
उनकी
माँ
की
मृत्यु
बचपन
में
हो
गयी
थी।
इनका
पालन
पोषण
और
देखभाल
इनकी
चाची
करती
थी।
स्कूल
की
पढ़ाई
के
बाद
बालन
ने
महाराजा
कालेज
में
प्रवेश
लिया।
वहाँ
भी
उनकी
पढ़ाई
सफलतापूर्वक
चली।
उस
समय
एक
गरीब
बालक
शंकर
नारायण
उनका
मित्र
बना।
बालन
ने
फिस
और
पुस्तकों
द्वारा
उसकी
यथा सम्भव
सहायता
की।
किन्तु
इन
दिनों
बालन
घर
की
पूजा
आरती
से
दूर
रहने
लगे।
उनके
लिए
कर्म
काण्ड
की
कोई
उपयोगिता
नही
थी।
अगर
भगवान
से
प्रार्थना
करनी
है
तो
वह
कही
भी
की
जा
सकती
है।
वे
कालेज
में
विज्ञान
के
छात्र
थे।
जीव
विज्ञान,
वनस्पति
विज्ञान
और
रसायन
शास्त्र
उनके
विषय
थे।
इस
समय
वे
कक्षाओं
में
उपस्थित
रहने
और
विज्ञान
पढ़ने
मे
अधिक
रुचि
नहीं
रखते
थे,
किन्तु
वे
परीक्षा
फिर
भी
पास
कर
लेते
थे।
यहाँ
इण्टर
पास
कर
लेने
पर
उनके
पिता
का
स्थानान्तरण
त्रिचूर
के
लिए
हो
गया
यहाँ
उन्होंने
विज्ञान
के
विषय
छोड़
कर
कला
के
विषय
ले
लिये।
इस
पढ़ाई
में
भी
उनका
अधिक
मन
नहीं
लग
रहा
था।
पिता
ने
उनके
लिए
टयूटर
भी
लगाया,
किन्तु
वह
भी
कारगर
नहीं
हुआ।
यद्यपि
वहाँ
से
उन्होंने
बी.
ए
पास
कर
लिया।
किन्तु
मद्रास
विश्व विद्यालय
नें
उन्हें
एम.
ए
में
प्रवेश
नहीं
दिया।
इसलिए
उन्हें
लखनऊ
विश्व विद्यालय
जाना
पड़ा।
लखनऊ
विश्व विद्यालय
में
बालकृष्ण
को
एम.
ए
करने
की
तथा
साथ
ही
एल.
एल.बी
की
परीक्षा
पास
करने
की
स्वीकृति
मिल
गयी।
वहाँ
उन्होंने
सन
1940
में
प्रवेश
लिया।
अंग्रेजी
साहित्य
पढ़ने
में
उन्होंने
अपनी
रुचि
पाई।
उसी
को
पढ़ने
में
उनका
अधिक
समय
जाता
था।
जिस
विषय
में
रुचि
नहीं
थी,
उसे
वे
छोड़
देते
थे।
इसलिए
उन्हें
अन्य
कार्य
करने
का
समय
मिल
जाता
था।
टेनिस
के
खेल
मे
वे
नियम
से
भाग
लेते
थे।
लखनऊ
विश्व विद्यालय
की
पढ़ाई
समाप्त
करने
के
बाद
बालकृष्ण
ने
पत्रकारिता
का
कार्य
प्रारम्भ
किया।
उन्होंने
अपने
चचेरे
भाई
का
टाइपराइटर
लेकर
कामनविल
समाचार
पत्र
के
लिए
लेख
लिखने
प्रारम्भ
किये।
उनके
लेख
मि.
ट्रैम्प
के
छद्म
नाम
से
प्रकाशित
हुए।
इन
लेखों
मे
समाज
के
गरीब
और
उपेक्षित
व्यक्तियों
का
चित्रण
था।
एक
तरह
से
ये
उस
समय
के
सरकार
और
धनी
पुरुषों
का
उपहास
था।
इन
लेखों
मे
मोची
की
कहानी
और
एक
गरीब
मजदूर
की
माँ
की
मृत्यु
का
वर्णन
बड़ा
ही
मार्मिक
था।
शीध्र
ही
पाठक
जान
गये
कि
मि.
ट्रैम्प
और
कोई
नहीं
श्री
पी.
बालकृष्ण.
मेनन
ही
है।
सन्
1948
में
बालकृष्ण
ऋषिकेश
पहुँचे।
वे
देखना
चाहते
थे
कि
भारत
के
सन्त
महात्मा
कितने
उपयोगी
अनुपयोगी
है।
वहाँ
पहुंचने
पर
उन्हें
स्वामी
शिवानन्द
की
जानकारी
हुई।
वे
दक्षिण
के
रहने
वाले
थे
और
उनकी
भाषा
अंग्रेजी
थी।
इस
कारण
बालकृष्ण
उनके
ही
आश्रम
में
जा
पहुँचे।
वहाँ
वे
स्वामी
जी
की
स्वीकृति
से
अन्य
आश्रमवासियों
के
साथ
रहने
लगे।
यद्यपि
वे
उस
समय
किसी
धार्मिक
कृत्य
में
विश्वास
नही
रखते
थे,
किन्तु
श्रद्धालु
पुरुष
की
भांति
आश्रमवासियों
का
अनुकरण
करते
हुए
रहने
लगे।
वे
प्रात:
काल
गंगा
जी
में
स्नान
करते,
सायंकाल
प्रार्थना
में
सम्मिलित
होते
और
आश्रम
के
काम
भी
करते।
इसी
समय
वे
स्वामी
शिवानन्द
जी
से
प्रभावित
हुए
और
उनसे
संन्यास
की
दीक्षा
ले
ली।
अब
उनका
नाम
स्वामी
चिन्मयानन्द
हो
गया।
वे
अपने
गुरु
से
मार्ग
-
दर्शन
पुस्तकालय
की
एक
-
एक
पुस्तक
लेकर
अध्ययन
करने
लगे।
दिन
भर
पढ़ने
के
लिए
पर्याप्त
समय
रहता।
उन
दिनों
आश्रम
में
बिजली
नहीं
थी।
इसलिए
रात
के
समय
पढ़ने
की
सुविधा
नही
थी।
स्वामी
जी
उस
समय
दिन
भर
पढ़े
हुए
विषयों
का
चिन्तन
करते
थे।
कुछ
दिनों
बाद
उनका
अध्ययन
गहन
हो
गया
और
वे
बड़े
गम्भीर
चिन्तन
में
व्यस्त
रहने
लगे।
उनकी
यह
स्थिति
देखकर
स्वामी
शिवानन्द
जी
ने
उन्हें
स्वामी
तपोवन
जी
के
पास
उपनिषदों
का
अध्ययन
करने
के
लिए
भेज
दिया।
उन
दिनों
स्वामी
तपोवन
महाराज
उत्तरकाशी
में
वाश
करते
थे।
उनके
पास
रहकर
लगभग
8
वर्ष
उन्होंने
वेदान्त
अध्ययन
किया।
तपोवन
जी
को
कोई
जल्दी
नहीं
थी।
वे
एक
घण्टे
नित्य
पढ़ाते
थे।
शेष
समय
शिष्य
मनन -
चिन्तन
में
व्यतीत
करता
था।
यह
अध्ययन
बौद्धिक
तो
था
ही,
किन्तु
व्यावहारिक
भी
था।
स्वामी
जी
को
अपनी
गुरु
के
शिक्षा
अनुसार
संयमी,
विरक्त
और
शान्त
रहने
का
अभ्यास
करना
होता
था।
इसके
परिणामस्वरूप,
स्वामी
जी
का
स्वभाव
बिल्कुल
बदल
गया।
जीवन
और
जगत्
के
प्रति
उनकी
धारणा
बदल
गई।
अध्ययन
समाप्त
करने
के
बाद
स्वामी
जी
के
मन
मे
लोक
सेवा
करने
का
विचार
प्रबल
होने
लगा।
तपोवन
जी
से
स्वीकृति
पाकर
वे
दक्षिण
भारत
की
ओर
चले
और
पूना
पहुँचे।
वहाँ
उन्होंने
अपना
प्रथम
ज्ञान
यज्ञ
किया।
यह
एक
प्रकार
का
नया
प्रयोग
था।
प्रारम्भ
में
श्रोताओं
की
संख्या
चार
या
छह
ही
था।
वह
धीरे
धीरे
बढ़ने
लगी।
लगभग
एक
महीने
के
ज्ञान
यज्ञ
के
बाद
वे
मद्रास
चले
गये
और
वहाँ
दूसरा
ज्ञान
यज्ञ
प्रारम्भ
किया।
इन यज्ञों
में
स्वामी
जी
स्वयं
प्रचार
करते
थे
और
स्वयं
यज्ञ
करते
थे।
कुछ
समय
बाद
ही
उनके
सहायक
तैयार
हुए
और
फिर
उसने
एक
संस्था
का
रुप
ले
लिया।
धीरे
-
धीरे
उनके
प्रवचनों
की
माँग
बढ़ने
लगी।
स्वामी
जी
ने
भी
ज्ञान
-
यज्ञ
का
समय
एक
महीने
से
घटाकर
पंद्रह
दिन
या
फिर
और
फिर
दस
दिन
या
सात
दिन
कर
दिया।
पहले
ये
ज्ञान
- यज्ञ
भारत
के
बड़े
शहरों
में
हुए,
फिर
छोटे
शहरों
में।
कुछ
समय
बाद
स्वामी
जी
विदेश
भी
जाने
लगे
और
पूरे
विश्व
में
ज्ञान
यज्ञों
की
धूम
मच
गयी।
अब
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