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दान कैसा हो और क्यों हो ?
"दानशीलता
-
इसके जरिए मैं दूसरों की जरुरतों को उतना ही महत्त्वपूर्ण मानने की कोशिश करता
हूँ जितनी कि मेरी खुद की जरुरतें--------पूज्य
गुरुदेव
स्वामी चिन्मयानन्द
-
साधक
उपनिषद् पर
प्रवचन
की एम पी -3 सी डी
प्राप्त
कर सकते है।
आगामी शिविर कार्यक्रम
1) ग्रैसफुल ऐजींग- इलाहाबाद
2) भागवत सप्ताह-द्वारका
3) गीता अध्याय 15 -कोलवन, लोनावाला
के पास, पुणे
4)
श्रीमद्भगवद्गीता- अध्याय
- VII
-
पोर्टब्लेयर

कब
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10-08-2008 08:51:40 AM |
---पुनर्जन्म
और कर्म
---ब्रह्मलीन स्वामी शंकरानन्द जी की पुण्य तिथि के अवसर
पर चिन्मय तपोवन ट्रस्ट द्वारा
संचालित
पितामह सदन, मंधना, कानपुर में आचार्य विश्वेश चैतन्य जी
के निर्देशन में
6 दिवसीय
साधना शिविर
दिनांक
24 सितम्बर से 29 सितम्बर 2008 तक
शिविर
अनुदान राशी- रुपये 600 प्रति साधक, रुपये 1100 प्रति
दम्पति रहने -खाने की सुवीधा सहित
सम्पर्क
चिन्मय मिशन, 4
/
284, नवशील सदन, फ्लैट न0
-202,
पार्वती बागला रोड़, कानपुर,
उत्तर प्रदेश-208002
फोन
- 0512-
2553313
ई
-
मेल-vedantijeevan@gmail.com
--------भगवान
शंकराचार्य द्वारा लिखे गये ग्रन्थ "तत्त्वबोध"
की हिन्दी मे व्याख्या परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी ने अपनी पुस्तक तत्त्वबोध
में की है ।
यह वेदान्त दर्शन का ज्ञान
कराने वाली प्रथम पुस्तक है। वेदान्त के सभी साधको को इस पुस्तक का अध्ययन
अवश्य़ करना चाहिए। हम साधकों को तत्त्व का ज्ञान कराने के लिए इस पुस्तक को
अंशो में प्रस्तुत कर रहे है।
अंश संख्या -29
पिछला अंश
एतत्कोशपञ्चकम्।
ये
पांच कोश हैं।
व्याख्या - ये
पांच कोश हैं जिनसे आत्मा आवृत होकर अज्ञात हो गया है। आत्मा पर पहला निकटतम
आवरण आनन्दमय कोश या कारण शरीर है। इससे तादात्म्य कर हम समझते हैं कि
सच्चिदानन्द आत्मा का हमें ज्ञान नहीं है। इससे अनुभव होने वाली प्रिय,
मोद
और प्रमोद की वृत्तियों का सुख ही हमें लुभाये रखता है।
आनन्दमय कोश पर
दूसरा आवरण बुद्धि का है। इससे तादात्म्य करने पर हम समझते हैं कि हमें यह
ज्ञान है और यह ज्ञान नहीं है। इस पर मन का आवरण पडने पर हम अपने को सुखी,
दुःखी,
क्रोधी आदि
अनुभव करते हैं। उस पर पुनः प्राणमय कोश का आवरण होने पर हम अपने को भूखा,
प्यासा चलता,
फिरता आदि अनुभव करते हैं। अन्नमय कोश उस पर अन्तिम आवरण है। उसमें स्थित होकर
हम अपने को मोटा,
पतला,
रोगी,
स्त्री-पुरुष ब्राह्मण आदि समझते हैं। आत्मा के अज्ञान में ये सब त्रुटिपूर्ण
अनुभव होते हैं,
जैसे पत्तियों के आवरण हटाकर मूंज की सींक निकाली जाती है,
उसी
प्रकार इन कोशों से परिच्छिन्न आत्मा का अनुसंधान करना चाहिए।
सर्वाधिकार सुरक्षित - वेदान्तीजीवन
(काँ) 2002
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